मैरी थेरेसे हैम्पर्टज़ौमैन

 

मैरी थेरेसे हैम्पर्टज़ौमैन की कहानी, एक खूबसूरत फ्राँसीसी महिला की हैं, जो मानवता के प्रति हमारे विश्वास को द्दढ़ करती हैं कि असीम दुःख के समय भी नेक आत्माएं भौगोलिक सीमाओं को लाँध कर एक मिसाल कायम करती है।

मैरी और उनके पति हेनरी, अपने बेटे सबेस्चियन से मिलने भारत आए थे, जो गुड़गांव की एक एम.एन.सी. में काम करते है और दिल्ली में रहते है। 13 मार्च 2014 की शाम को बेहोशी की हालत में मैरी को मैक्स की इमरजेंसी में ले जाया गया। डॉक्टरों ने पाया कि मैरी को ‘सबरैचनॉइड रक्तस्राव’ हो गया हैं, जिसका अर्थ था कि एक अपरिवर्तनीय क्षति से उनकी मस्तिष्क मृत्यु हो गई थी। सबेस्चियन अपनी माँ को विदेश में अचानक खोने से बहुत दुःखी थे। मैक्स के डॉक्टरों ने मोहन फाउंडेशन के काउंसलर के साथ मिल कर उनसे अंग-दान करने के बारे में बात की। अंग-दान की बात सुन कर वे बड़ी उलझन में पड़ गये, क्योकि यदि वे अपनी माँ  के अंगों का दान करते हैं, तो जीवन दान उन लोगों को मिलेगा जो उनके देशवासी नहीं थे। साथ ही अपनी माँ को अंतिम संस्कार के लिए फ्रांस ले जाने का भी बंदोबस्त करना था, जो थोड़ा कठिन काम था।

मोहन फाउंडेशन काउंसलर ने सबेस्चियन के साथ घंटों चर्चा की, उन्हें मस्तिष्क-मृत्यु, अंग दान की प्रक्रिया, वेंटिलेटर आदि से संबंधित कानूनों को समझाया। अंत में वे और उनके पिता आश्वस्त हो गये और उन्होने अंग-दान करने का निर्णय ले लिया क्योंकि मैरी हमेशा से यही चाहती थी।

हैम्पर्टज़ौमैन फ्राँस के एक छोटे से सुरम्य गांव, सेन-बेल से हैं जो कि लीऑन से 20 किलोमीटर की दूरी पर है। इस गाँव में हर कोई जानता था कि मैरी एक बेहतरीन खाना बनाती है और वृद्ध पड़ोसियों को  उनके घर और बाहर के कामों में मदद करती हैं। उन्होने अपने शुरूवाती जीवन में फ्राँस के वित्त मंत्रालय में काम किया था और बाद में मैरी अपना समय यात्रा, ट्रेकिंग और नृत्य में बिताती थी। फ्राँस में अंग दान की ‘ऑप्ट आउट ’प्रणाली है। इसका अर्थ यह हैं कि यहाँ प्रत्येक नागरिक को अंग-दाता माना जाता है, जब तक कि उन्होने इसके लिये मना नहीं किया हो। मैरी ने कई मौकों पर अपने परिवार से अंग-दान  के बारे में भावुकता से बात की थी।

मोहन फाउंडेशन के कॉड़ीनेटर से बात करते हुये सबेस्चियन ने कहा कि मेरी मां की हमेशा से यह इच्छा थी कि वे बहुत पीड़ित होकर, अपने परिवार पर बोझ बन कर मरना नहीं चाहती थी। सही तो यह होता कि वह अपने देश में मरती और उनके अंग उनके अपने देशवासियों की जान बचाने में काम आते। लेकिन वे खुश थे हैं कि इस निर्णय से उनकी माँ की इच्छा पूरी हो रही हैं और इस प्रक्रिया से, दूसरों को जीवन का उपहार मिल रहा हैं। उन्होंने कहा कि इसके बाद, उनका पारिवारिक इतिहास सदैव के लिए भारत से जुड़ गया हैं। उनकी दोनों किडनी मैक्स अस्पताल के मरीजों और लिवर आर.आर. आर्मी अस्पताल के एक आर्मी जवान को दिया गया ।

हेनरी जिन्हें केवल फ्रेंच भाषा ही आती थी, उन्होंने बाद में काउंसलर को  फ्रेंच  में एक पत्र लिखा। पत्र  का अनुवाद यह हैं कि “यह मेरे लिये बहुत दुखद था कि मैं आपके साथ संवाद नहीं कर पा रहा था, लेकिन बात करते समय आपके चेहरे के भाव और आपकी आंखों की संवेदनशीलता, मुझे महसूस हो रही थी और मैं समझ रहा, जो आप कह रही थी।”

मैरी को भारत से प्यार था, जैसा कि आलीशान ताज के सामने उनकी तस्वीर से साफ दिखाई देता है। उन्हें जो मिला उससे अधिक उन्होंने इस दुनिया को वापस दे दिया … तीन लोगों को जीवन-दान दे कर मैरी अमर हो गई ।