डॉ. शैल गुप्ता

 

अक्सर हम कुछ बातों को सच मान लेते हैं, जैसे कि’पुलिसकर्मी कभी डरते नहीं हैं’, ‘शिक्षक सीखते नहीं हैं’, ‘नेता किसी का अनुसरण नहीं करते’ और ‘डॉक्टर कभी बीमार नहीं पड़ते’। लेकिन भावी का अपना नियम होता हैं और दुनिया की कोई भी धारणा इसको नहीं बदल सकती ।

डॉ. शैल गुप्ता और उनके पति दोनों ही होम्योपैथिक डॉक्टर थे, जिनकी दिल्ली के मॉडल टाउन में स्वयं की क्लिनिक थी। वे एक आध्यात्मिक और परोपकारी स्त्री थी। वे हर सुबह 5 बजे अपने पति के साथ टहलने जाती, आकर परिवार के लिए खाना बनाती, घर का कामकाज संभालती और फिर वह क्लिनिक जाती, ताकी उनके रोगियों का स्वास्थ बेहतर हो सके।

यह भाग्य की विडंबना हीं थी कि दूसरो का इलाज करने वाली, डॉ. शैल गुप्ता को 29 जुलाई, 2012 को अचेत अवस्था में एक निजी अस्पताल में, आपातकालीन स्थिति में लाया गया। डॉक्टरों ने उन्हें जीवित रखने के लिए बहुत मेहनत की, लेकिन 59 वर्षीया श्रीमती गुप्ता मस्तिष्क-मृत्यु की अपरिवर्तनीय स्थिति में जा चुकी थीं। परिवार शोकाकुल था, लेकिन डॉक्टरों का परिवार होने के नाते वे स्थिति की वास्तविकता और नाजुकता को समझते थे।

प्रत्यारोपण कॉड़ीनेटर  द्वारा अंग दान के लिए बड़ी बेटी और उनके पति जो दोनों ही डॉक्टरों थे, से बात की गई और परामर्श दिया गया। वे मस्तिष्क की मृत्यु को समझते थे और अंग- दान के विचार पर भी सहमत थे। इसी बीच परिवार के अन्य सदस्य उनकी छोटी बेटी, उनके पति, ससुराल और मायके वाले परिवार जन भी आ गये। उन सभी को मस्तिष्क की मृत्यु की अवधारणा, अंग दान कैसे होगा, कौन से अंगों का दान होगा आदि के बारे में समझाया गया। उन्हें मस्तिष्क- मृत्यु का एक एनीमेशन दिखाया गया था ताकि उन्हें पूरी प्रक्रिया स्पष्टता से समझ आ सके। हालांकि, वे सुनिश्चित नहीं थे कि उनके पिता की प्रतिक्रिया कैसे होगी। लेकिन जब डॉ. गुप्ताजी से भी बात की गई तो वे भी सहमत हो गए और कहा कि, “मेरी पत्नी अपने अंगों को दान करना चाहती थी”। उन्होंने यह भी साझा किया कि जब उनके पिता की मृत्यु हुई तब उनके पिता के नेत्र-दान करने के लिए उनकी पत्नी ने बहुत दौड़-धुप की थी, लेकिन बहुत देर होने के कारण नेत्र-दान हो नहीं पाया था।

परिवार ने यह भी बताया कि उन्होंने आई.सी.यू के बाहर अंग दान  का संदेश देखा था और आपस में उन्होने अंग दान की संभावना पर चर्चा भी शुरू कर दी थी। परिवार ने मिल कर सबकी सम्मति से उनके अंगों को दान करने का फैसला लिया। उनके मरीज़ों ने उनकी  मृत्यु  पर बहुत दु: ख व्यक्त किया। लेकिन जो काम वे अपनी जीवित अवस्थी में करती थी..वही काम मरते हुये भी, वे बखूबी सेकर गई… लोगों को जीवन-दान देने का।